मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाओ… यह दिवस निरंतर जलने वाली एक ज्योत है… आप सभी सचमुच बड़े सौभाग्यशाली हैं क्योंकि आपको आज सही समय पर सही चीज की पहचान हो रही है । 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा शुरू किया गया एक ऐसा दिवस है जिसका महत्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं है । यह दिवस निरंतर जलने वाली एक ज्योत है, जिसके प्रकाश से मन की सारी बुराइयाँ मिटने लगती हैं । हमें कभी भी अपने माता-पिता एवं गुरु का कर्ज तथा अपना फर्ज भूलना नहीं चाहिए ।
शत शत प्रणाम ! कोटी कोटी प्रणाम ! माता-पिता और सद्गुरु से उच्च नहीं किसी और का स्थान। माता-पिता अपना जीवन संतानों के पालन-पोषण में समर्पित कर देते हैं।
हमारे माता-पिता के उपकार को, उनकी हमारे लिये सही गयी पीड़ा को व्यर्थ नहीं जाने देंगे । संतों-महापुरुषों व शास्त्रों द्वारा दिखाये गए मार्ग पर चलते हुए अपनी संस्कृति, गुरुजनों और माता-पिता की सेवा करते रहेंगे और हर वर्ष 14 फरवरी को 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' के रूप में मनायेंगे ।
शिवपुराण में आता है – 'जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल अवश्य सुलभ हो जाता है ।' आओ ! हम भी अपने माता-पिता का पूजन कर के धन्य हो जायें ।
सबसे पहले बैकग्राउंड में शंख की ध्वनि सुनायी देगी ।
आसन विधि : सर्व प्रथम माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बिठायें ।
तिलक विधि : बेटे-बेटियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें ।
पुष्प-फूलमाला विधि : माता-पिता के सिर पर पुष्प एवं अक्षत रखें । और उन्हें फूलमाला पहनायें ।
परिक्रमा विधि : जैसे भगवान गणेशजी ने अपने पिता भगवान शिवजी और माता पार्वती जी की सात परिक्रमा कर सर्वप्रथम पूजनीय होने का वरदान पाया, आशीर्वाद पाया और वे वंदनीय हो गये । ऐसे ही हम भी अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करें । इससे पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है ।
प्रणाम विधि : माता-पिता को झुककर विधिवत् प्रणाम करें ।
आरती विधि : थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें ।
बच्चों को तिलक विधि : अब माता-पिता भाव-विभोर होकर बच्चों के माथे पर तिलक करें ।
फिर माता-पिता बच्चों के सिर पर स्नेहपूर्वक पुष्प व अक्षत रखें और अपने गले की फूलमाला बच्चों को पहनायें । मानो अपने जीवन की सारी दुआएँ, सारी खुशियों के फूल उनके गले में डाल रहे हैं ।
पूज्य बापूजी का कल्याणकारी संदेश है कि ''अब बच्चे थोड़ी देर मौन बैठें । माता-पिता अपने बच्चों को स्नेहपूर्वक देखें और मन-ही-मन उनके प्रति आत्मकृपा बरसायें । इस समय बच्चे आदर से, सद्भाव से माता-पिता को निहारें… ''
बच्चों के सिर पर हाथ घुमायें… उन्हें शुभ आशीष दें । माता-पिता अपनी संतान को प्रेम से सहलायें । बच्चे अपने माता-पिता के गले लगें…
ऐसा प्रेम-दिवस मनाकर कइयों की आँखें छलक उठी हैं । माँ का दिल अपने बच्चे के लिए भाव से भर गया है । पिता भी गदगद हो रहे हैं । हों भी क्यों न ?? यह 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' पवित्र प्रेम को जगाता है ।
अब बेटे-बेटियाँ हाथ जोड़कर अपने माता-पिता को निहारते हुए ये पवित्र संकल्प करेंगे :
अब हर शुभ घड़ी की तरह, बेटे-बेटियाँ माता-पिता का मुँह मीठा करें और माता-पिता भी अपने बच्चों को मधुर-प्रसाद खिलायें ।
तो यह है पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से शुरू हुआ दिवस 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' । ये ही है सच्चा प्रेम दिवस न कि पाश्चात्य की देन-वैलेंटाइन डे ।